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25 Jul 2019

सरकारों ने कुर्बानियों के दिल पर ठोकर मारी अतः स्वतंत्रता सेनानी परिवारों से एक आह्वान - राज कृष्ण वर्मा

गुरूग्राम। गुरूग्राम निवासी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी के पुत्र व सेवानिवृत शिक्षा अधिकारी राज कृष्ण वर्मा ने अपने उद्गार व्यक्त किये हैं कि हमारी राज्य और केंद्र सरकार द्वारा स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की सजावट के लिए एक शाल का लालच देकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को आमंत्रित कर केवल सजावट की वस्तु के रूप में ही प्रयोग किया जाता है। इन राष्ट्रीय पर्वों के बाद किसी भी स्वतंत्रता सेनानी को जो आज 100 वर्ष आयु के वयोवृद्ध हैं, कोई उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछने के लिए मेडिकल ऑफिसर नहीं जाता उनके पारिवारिक जीवन के बारे में पूछने के लिए कोई कार्यकारी अधिकारी नहीं जाता। उनके दफ्तरों में जाकर भी  अपना परिचय स्वतंत्रता सेनानी कह कर देना होता है और आज के पीढ़ी के बहुत सारे युवक स्वतंत्रता सेनानी का अर्थ भी नहीं समझते। उनको इस शब्द का अर्थ तभी समझाया जा सकता था जब राष्ट्र के लिए निस्वार्थ सेवा करने निकले, अपने वयोवृद्ध माता-पिता की देखभाल के कर्तव्य से विमुख होकर, अपने दूध पीते बच्चे की जरूरतों को अनदेखा करके, अपने घर की जवान पत्नी को भाग्य भरोसे छोड़कर अपनी जवानी की आहुति देकर, अपने खून से सीँच कर, भारत माता के मस्तिष्क पर लगे हुए गुलामी के दाग को मिटाने जाने वाले इन परम आदरणीय देवतुल्य हस्तियों को, जो भाग्य से जीवित बच गए थे, शासन में देव तुल्य स्थान देकर दिन-प्रतिदिन सम्मानित किया जाता।
वेद पुराणों के इस देश भारत की प्रथा रही है;
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
                  उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
                  जिस पथ जावें वीर अनेक।।
भारत ऐसा देश है जहां राष्ट्र भक्तों के पथ पर फूल बिछाए जाने की प्रथा है, उनके जीवन से जुड़े हुए पत्थरों तक की पूजा की जाने की प्रथा है, उनके गृह अवशेषों को मंदिर की तरह पूजने की प्रथा है  वहां पर भारत की सरकार ने इन देवतुल्य हस्तियों को मात्र सजावट की वस्तु  समझा है। स्वतन्त्र भारत देश में स्वतन्त्रता सेनानियों के अनगिनत परिवार रोटी , कपड़ा , मकान और रोजगार से वंचित हैं । ऐसे परिवारों के हित के लिये सरकारों ने आज तक सहानुभूति प्रकट करके कोई भी कदम नहीं उठाया न ही कोई स्वतन्त्रता सेनानी परिवार हितैषी योजना को लागू किया । जो अति दुखद है।  माननीय न्यायालय ने हमें उन सभी अधिकारों और सहूलियतोँ का पात्र स्वीकार किया है जो हमारे पूजनीय माता-पिता दादा-दादी स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई थी। यह बेहद शर्मनाक है कि भारत सरकार उन परिवारों को दी जाने वाली सुविधाओं का विरोध कर रही है। शर्मनाक, शर्मनाक है, शर्मनाक है।
बुटेला सुरेंद्र के शब्दों में;
"बसंती जज्बातों का कोई मोल नहीं होता। जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों की बदौलत हिंदुस्तान में आजादी का सूरज उगा, जो देशवासियों के दामन से गुलामी का दाग धो कर चले गए, आज आजाद भारत सरकार उन्हीं के विरोध में कोर्ट में खड़ी है। इस विरोध की कोई मर्यादा ही नहीं है।
यह विरोध तो देशद्रोह से भी ज्यादा है
सरकारों ने कुर्बानियों के दिल पर ठोकर मारी है। गत वर्ष स्वतन्त्रता दिवस पर देश के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी परिवारों ने स्वयं को सरकारों द्वारा नजरंदाज और कोई सुध न लिये जाने के विरोध में स्वतंत्रता दिवस पर सरकारी कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज नहीं करवाई थी। इन, प्रतिकूल परिस्थितियों के विरोध में आक्रोश दिखाने के लिए मैं आह्वान करता हूं कि कोई भी स्वतंत्रता सेनानी परिवार का सदस्य राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में भाग न ले, इन उत्सवों में हमारे परिवारों के लिए लगाई गई कुर्सियां खाली रहेंगी तभी किसी हितैषी, राजनेता , अधिकारी या मीडिया को अवश्य ही चुभन महसूस होगी। हम अपने अपने व्यक्तिगत प्रांगण में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाए। वास्तव में हमने अपने अथक प्रयत्नों से, गर्म खून की बलि देकर इन शुभ दिनों को लाकर भारत माता के मस्तिष्क से गुलामी का दाग धो कर उसके पवित्र मस्तिष्क पर स्वतंत्रता दिवस से तिलक लगाया है,तथा सफलताओं रूपी गणतंत्र दिवस से भारत माता की मांग सजाई है। यह पर्व हमारे हैं। माननीय न्यायालय का बहुत-बहुत धन्यवाद कि उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी परिवारों की सुध तो ली।

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