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29 Jul 2019

मजदूरों का 10 रुपये में पेट भरती हैं सोसायटी की महिलाएं, कहा- यह भी देश सेवा

नई दिल्ली। रोज दोपहर के 12-12:30 बजते ही वेस्ट दिल्ली के माया एन्क्लेव मेन गेट के बगल में लोग जुटने लगते हैं। ये सभी माया पुरी इंडस्ट्रियल एरिया के कामगार हैं या फिर आसपास के घरों में काम करने वाले लोग। कुछ जनकपुरी-मायापुरी रोड के राहगीर भी हैं। इन्हें इंतजार है सोसायटी की महिलाओं के एक समूह का जो इस दौड़ती-भागती दिल्ली में इन्हें महज 10 रुपये में घर जैसा बना खाना मुहैया करा रहा है, वह भी रोज, बिना नागा...लगभग 8 महीनों से। हां संडे जब कामगारों की छुट्टी तो इन महिलाओं का भी हॉलिडे है। इस सेवा पर कोई कयास लगाने के बजाय हमने खाना खिला रही महिलाओं से खुद पूछा कि रोजाना इतनी मेहनत आखिर क्यों जवाब मिला कि यह भी देशसेवा है। प्रधानमंत्री मोदी का जिक्र करते हुए वह कहती हैं कि हर इंसान को अपनी क्षमता के मुताबिक दूसरों की मदद करनी चाहिए। इसी मकसद से ये सभी महिलाएं अपने घर-परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद कुछ पुरुष सहयोगियों के साथ थोड़ी देर के लिए इस सेवा में आती हैं। 
कहां से मिली प्रेरणा? ग्रुप की सबसे अहम सदस्य, सीमा ने बताया कि इस इलाके में कई इंडस्ट्री हैं, जहां काफी लोग काम करने आते हैं, लेकिन सस्ता और अच्छा खाना कम को ही नसीब है। इसी से समूह को खाना खिलाने की प्रेरणा मिली। मैंने सवाल किया कि फिर 10 रुपये भी क्यों, तो वंदना ने कहा कि यह फूड फॉर डिग्निटी है। खाने वाले को लग रहा है कि वह भीख या दान नहीं ले रहा, जो खा रहा है, पूरे स्वाभिमान से उसकी कीमत दे रहा है। रोज का मेन्यू भी अलग-अलग है। इस टीम में शामिल कोशी बताती हैं कि खाने में चावल रोज होता है, साथ में कभी दाल और अचार, कभी छोले, राजमा या कढ़ी होती है। वंदना कहती हैं कि इको-फ्रेंडली माहौल बना रहे, इसके लिए खाना परोसने में प्लास्टिक कतई इस्तेमाल नहीं होता। खाना बांटते हुए लोगों को हिदायत भी दी जाती है कि कोई गंदगी नहीं फैलाएगा या खाली प्लेट यों ही नहीं फेंकेगा। फिर भी कुछ लोग ना मानने वाले भी होते हैं तो महिलाओं की यही टीम लंच परोसने के बाद वहां की सफाई भी करती हैं। वैसे जब यह मुहिम शुरू हुई तो पहले 60-70 लोग जुटते थे। अब तो 250 लोगों के खाने का औसत है। 
प्रति प्लेट खर्च कितना आता है, इसका जवाब इस मुहिम की अगुआई करने वाले वंदना के पति संजय देते हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट संजय कहते हैं, प्रति प्लेट खर्च 22-23 रुपये आता है, तो फिर 10 रुपये में मैनेज कैसे होता है। वह बताते हैं कि कई बार लोग पैसों या राशन से मदद कर देते हैं। इस टीम के लोग खुद भी अपनी सामर्थ्य से योगदान करते हैं। हां, खाना कभी फ्री नहीं होगा, क्योंकि यह खाने की मर्यादा और खाने वाले की गरिमा, दोनों को बनाए रखने के लिए जरूरी है।माया एन्क्लेव सोसायटी में कभी किसी का जन्मदिन या घर में कोई और खुशी का मौका होता है, तो वह इस खुशी को आम लोगों से बांटने के लिए किसी दिन के खाने का खर्च खुद भी उठा लेते हैं, तो कोई महीने भर का राशन दे देता है। 

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