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19 Sep 2018

मुस्लिम पहलवान जुम्मा दादा ने पहली बार कराया सार्वजनिक गणेश महोत्सव : पहल


वडोदरा। हर वर्ष गणेश चतुर्थी के मौके पर प्रशासन के आगे सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने की चुनौती होती है। खास तौर पर विसर्जन के दिन सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस विभाग के सामने शांति स्थापित करने की चुनौती होती है। इसके बावजूद झड़पों की खबरें सामने आती हैं। गुजरात के संस्कार नगरी क्षेत्र में एक मुस्लिम शख्स ने 107 साल की उम्र में सामाजिक एकता के लिए सार्वजनिक गणेश महोत्सव की शुरुआत की थी।बड़ौदा राज्य के जाने-माने पहलवान जुम्मा दादा ने देशभक्ति की भावना के साथ 1901 में अपने अखाड़े से गणेश महोत्सव की शुरुआत की थी। प्रफेसर मानेकराव के जुम्मा दादा व्यायाम मंदिर के मैनेजिंग ट्रस्टी राजेंद्र हरपाले कहते हैं, 'जुम्मा दादा ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोकमान्य तिलक से प्रेरित होकर शहर में सार्वजनिक गणेश महोत्सव की शुरुआत की थी। तिलक महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय से मिलने के लिए अक्सर बड़ौदा जाते थे। उन्हें जुम्मा दादा और उनकी गतिविधियों के बारे में पता चला तो उन्होंने उनसे मुलाकात करने का निर्णय लिया।' 
जुम्मा दादा ने 19वीं सदी के मध्य में व्यायाम मंदिर की स्थापना की थी और इसका पंजीकरण 1880 में कराया गया था। उनका अखाड़ा लड़कों और लड़कियों के बीच काफी चर्चित था, जिसकी वजह से तिलक ने उन्हें सार्वजनिक गणेश महोत्सव की व्यायाम मंदिर में शुरुआत करने का सुझाव दिया था। इस विचार के जरिए कोशिश की गई थी कि सभी युवाओं को एकसाथ लाया जाए और महोत्सव के जरिए देशभक्ति की भावना उनके भीतर विकसित हो। जुम्मा दादा ने वर्ष 1901 में व्यायाम मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना की। हरपाले बताते हैं, 'भगवान गणेश की मूर्ति मिट्टी से बनी हुई थी और हमन उसे आज तक वैसे ही सुरक्षित रखा है।' हरपाले कई कार्यक्रमों के पुराने पर्चे दिखाते हैं कि गणेश चतुर्थी के दौरान किस तरह से अखाड़े में तलवारबाजी, पहलवानी जैसे आयोजन होते थे। 
इतिहासकार चंद्रशेखर पाटील कहते हैं कि शहर के कुछ मंदिरों और मंडलों में गणेश महोत्सव मनाया जाता था। पाटील बताते हैं, 'हालांकि, जुम्मा दादा द्वारा आयोजित गणेश महोत्सव पहला सार्वजनिक पर्व था, जिसने बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ जोड़ा और उनके भीतर देशभक्ति की भावना का संचार किया।' एक अन्य इतिहासकार डॉक्टर दामोदर नेने बताते हैं, 'जुम्मा दादा ने 1901 में अपने अखाड़े में गणेश महोत्सव की शुरुआत की थी, प्रफेसर मानेकराव ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।' 

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