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14 Jun 2019

अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद द्वारा जातीय विद्वेष फैलाने वाली फिल्म “आर्टिकल 15” के प्रदर्शन पर रोक की मांग की

नई दिल्ली। अनुभव सिन्हा निर्देशित और आयुष्मान खुराना अभिनीत फ़िल्म “आर्टिकल 15” का वीडियो देखने के बाद सवर्ण समाज, ख़ासतौर पर ब्राह्मण समाज, में उबाल है। “आर्टिकल 15” यानी समानता के अधिकार पर बनी यह फिल्म ब्राह्मण समाज का प्रतिरोध झेल रही है । यूं तो भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था लेकिन बीते कुछ सालों में ये आर्टिकल अलग-अलग वजहों में लगातार चर्चाओं में रहा है। 28 जून 2019 को रिलीज होने वाली फिल्म “आर्टिकल 15” के प्रचार-प्रसार के लिए जो ट्रेलर, निर्माता और निर्देशकों द्वारा रिलीज किया गया है, वह सामाजिक समरसता को भंग करने वाला प्रतीत होता है । फिल्म निर्माताओं ने यह फिल्म उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में पिछड़ी जाति (शाक्य) की दो बालिकाओं के साथ हुए बलात्कार और उसके उपरांत हत्या की सत्य घटना पर आधारित की है।
जो घटना असल में हुई थी उसमें नामित लोग यादव जाति के थे।  ब्राह्मण समाज के दृष्टिकोण में सामाजिक विक्षोभ और विद्वेष पैदा करने वाली बात यह है कि इसमें एक जाति विशेष यानी ब्राह्मणों को बलात्कारी और हत्यारा दिखाया गया है, जो कदापि उचित और स्वीकार्य नहीं है । परिषद की राष्ट्रीय प्रवक्ता डाक्टर अभिलाषा द्विवेदी ने बताया कि पहली बात तो यह है कि बलात्कारियों की कोई जाति नहीं हो सकती । बलात्कारी सिर्फ बलात्कारी और अपराधी होता है । उसे किसी जाति से जोड़ना उचित नहीं है। उसे सिर्फ अपराधी की तरह ही संबोधित किया जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि बदायूं की घटना में जिन व्यक्तियों के ऊपर बलात्कार और हत्या का आरोप लगा था वह ब्राह्मण नहीं थे। इस विषय पर स्थानीय पुलिस और केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो की रिपोर्ट में कहीं भी किसी ब्राह्मण के संलिप्त होने का कोई जिक्र नहीं है। परंतु फिल्म में अपराधियों को न सिर्फ ब्राह्मण चित्रित किया जा रहा है बल्कि किसी धार्मिक परिवार यानी “महंत जी के बेटे” के रूप में  प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरी तरफ यह फिल्म दलितों के प्रति भी विद्वेषपूर्ण है। फिल्म में बलात्कार पीड़िता को दलित दिखाया गया है। मतलब यह कि जो जब चाहे दलितों की बेटियों के साथ बलात्कार होता दिखा सकता है, मानो उनकी कोई इज्जत अस्मिता नहीं है। यदि निर्माता-निर्देशक तथ्यों पर आधारित फिल्म ही बनाना चाहते हैं तो उसके लिए सही रास्ता डॉक्यूमेंट्री यानी वृत्तचित्र है, ना की फीचर फिल्म । 
यदि वह फीचर फिल्म बना रहे हैं तो मौलिक तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। इससे एक तो निरपराध जाति या वर्ग के लोगों के ऊपर दोषारोपण का भय होता है, दूसरे समाज, जनमानस तथा देश में उनकी छवि खराब होती है। इससे सामाजिक समरसता भी भंग होती है। आज जब हम सभी मिलकर देश से जातीय विभाजन को खत्म करना चाहते हैं; तो इस तरह की फिल्मों का जातीय चित्रण सर्वथा अनुचित है । निर्माता और निर्देशकों के इस कुकृत्य एवं अविवेकपूर्ण चित्रण के कारण संपूर्ण समाज में क्रोध और विक्षोभ है, जो समाज में अस्थिरता पैदा कर सकता है । यह अनावश्यक जातीय विद्वेष फैला सकता है । अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद ने प्रदेशों के राज्यपालों को पत्र लिखकर फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की है।  पत्र में यह अनुरोध किया गया है की संपूर्ण राज्यों में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाई जाए और निर्माता निर्देशकों को हम सभी की भावनाओं से अवगत कराते हुए उन्हें फिल्म में आवश्यक सुधार करने की कठोर सलाह दी जाय।परिषद ने केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को भी पत्र लिखकर फिल्म का  प्रमाणपत्र रद्द करने की मांग की है। परिषद ने सभी थियेटर मालिकों से यह अनुरोध किया है कि सामाजिक समरसता को भंग करने वाली इस फिल्म को वह न दिखायें।अखिल भारतीय ब्राह्मण एकता परिषद ने कई प्रदेशों में न्यायालय में याचिका दायर कर कानूनी प्रक्रिया के तहत भी इसपर रोक लगने की मांग की है। डाक्टर अभिलाषा द्विवेदी का कहना है कि यदि फिल्म पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो ब्राह्मण समाज आन्दोलन करने के लिए बाध्य होगा।

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