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8 Jan 2019

सीबीआई निदेशक पद पर बहाल हुए आलोक वर्मा, केन्द्र सरकार और केन्द्रीय सतर्कता आयोग को झटका : राष्ट्रीय

दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने आलोक कुमार वर्मा को मंगलवार को सीमित अधिकारों के साथ सीबीआई के निदेशक के पद पर बहाल कर दिया। न्यायालय ने केन्द्र सरकार और केन्द्रीय सतर्कता आयोग को झटका देते हुये आलोक वर्मा को निदेशक की शक्तियों से वंचित कर अवकाश पर भेजने का उनका आदेश निरस्त कर दिया। हालांकि, वर्मा को शक्तियों और अधिकार से वंचित करने की तलवार अभी भी उनके सिर पर लटकी हुयी है क्योंकि शीर्ष अदालत ने कहा है कि सीबीआई प्रमुख का चयन करने वाली उच्चाधिकार वाली समिति एक सप्ताह के भीतर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाले केन्द्रीय सतर्कता आयोग के मामले पर विचार करेगी।न्यायालय ने साथ ही स्पष्ट किया कि पद पर बहाली होने पर वर्मा समिति का निर्णय होने तक कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला लेने से गुरेज करेंगे। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की तीन सदस्यीय पीठ ने अपने 44 पेज के फैसले में वर्मा को उनकी शक्तियों से वंचित करने और जांच ब्यूरो के संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को सीबीआई के निदेशक का कामकाज देखने संबंधी केन्द्रीय सतर्कता आयोग और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के 23 अक्टूबर, 2018 के आदेशों को निरस्त कर दिया।पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हम यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि सीबीआई निदेशक वर्मा, बहाल होने पर, समिति से ऐसी कार्रवाई या निर्णय लेने की अनुमति मिलने तक कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला लेने से बचेंगे। यह फैसला प्रधान न्यायाधीश ने लिखा लेकिन चूंकि आज वह उपस्थित नहीं थे, इसलिए न्यायमूर्ति कौल ने यह निर्णय सुनाया। इसके साथ ही न्यायालय ने अपने फैसले में प्रधान मंत्री, प्रधान न्यायाधीश और प्रतिपक्ष के नेता की सदस्यता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति को एक सप्ताह के भीतर बैठक करने के लिये भी कहा।
इसी उच्चाधिकार प्राप्त समिति के चयन के आधार पर आलोक कुमार वर्मा को 19 जनवरी 2017 को दो साल के लिये सीबीआई के निदेशक पद पर नियुक्त किया गया था। आलोक वर्मा का मसला जांच ब्यूरो के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के साथ हुये विवाद के इर्दगिर्द सिमटा हुआ था क्योंकि दोनों ही अधिकारियों ने एक दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे। सरकार ने इन दोनों ही अधिकारिरयों को उनकी शक्तियों से वंचित करके अवकाश पर भेज दिया था। यद्यपि आलोक वर्मा ने उन्हें निदेशक के अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेजने के निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी लेकिन अस्थाना ने शीर्ष अदालत से कोई राहत नही मांगी। बल्कि वह भ्रष्टाचार के आरोपों में जांच ब्यूरो द्वारा अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द कराने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचे।शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘हम यह एकदम स्पष्ट करते हैं कि इस अंतरिम अवधि के दौरान और इस आदेश के अनुसार सीबीआई निदेशक के रूप में आलोक कुमार वर्मा कोई नयी पहल , जिसका कोई बड़ा नीतिगत या संस्थागत प्रभाव हो, के बगैर ही रोजमर्रा के काम तक खुद को सीमित रखेंगे।’ पीठ ने अपने फैसले में विनीत नारायण प्रकरण में दी गयी अपनी व्यवस्था और इसके बाद कानून में किये गये संशोधन का जिक्र करते हुये कहा कि विधायिका की मंशा सीबीआई निदेशक के कार्यालय को हर तरह के बाहरी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रखने और सीबीआई की संस्था के रूप में निष्ठा और निष्पक्षता बरकरार रखने की रही है। शीर्ष अदालत का 1997 का विनीत नारायण प्रकरण में सुनाया गया फैसला देश में उच्च पदों पर आसीन लोक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से संबंधित था।
शीर्ष अदालत ने दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान कानून के एक प्रावधान का भी जिक्र किया जिसके अनुसार चयन समिति की सहमति के बगैर सीबीआई निदेशक का तबादला नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि विधायिका की मंशा इस तरह की स्थिति में सीबीआई निदेशक के खिलाफ सरकार को अंतरिम उपाय करने के लिये कोई अधिकार देने की नहीं थी। न्यायालय ने कहा कि यदि ‘तबादला’ शब्द को सामान्य बोलचाल के नजरिये से समझा जाये और इसे एक पद से दूसरे पद पर भेजने तक सीमित रखा जाये तो इस तरह ‘समिति से पहले सहमति’ लेने की अनिवार्यता का प्रावधान विधायिका की ऐसी मंशा को निष्फल करता है।शीर्ष अदालत ने कहा कि यही कल्पना की गयी है कि सीबीआई संस्था को हर तरह के बाहरी प्रभाव से दूर रखना जरूरी है ताकि वह जनहित में बगैर किसी भय और पक्षपाता के प्रमुख जांच एजेन्सी और अभियोजन एजेंसी की अपनी भूमिका निभा सके। न्यायालय ने कहा कि संस्थान के मुखिया, निदेशक को स्वतंत्रता और निष्ठा की अपने आप में एक मिसाल होना चाहिए जो उसे संसद की अपेक्षाओं के अनुरूप हर तरह के नियंत्रण और हस्तक्षेप से मुक्त रखना सुनिश्चित कर सके। पीठ ने कहा कि सभी प्राधिकारियों को जांच ब्यूरो के निदेशक के कामकाज में हस्तक्षेप करने से दूर रहना चाहिए।
जांच ब्यूरो के निदेशक के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता पड़ने जैसी स्थिति के बारे में पीठ ने कहा कि ऐसी आवश्यकता की पृष्ठभूमि में जनहित प्रमुख होना चाहिए और इस तरह की आवश्यकता को सिर्फ समिति की राय से ही परखा जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि संबंधित कानून में जांच ब्यूरो के निदेशक के अंतरिम निलंबन या पद से हटाने का प्रावधान नहीं है और ऐसा कोई भी निर्णय उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति की सहमति के बाद ही लिया जा सकता है।

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