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19 Jan 2019

'पाकिस्तानी' शख्स ने मांगी भारत की नागरिकता : मुंबई

मुंबई। मुंबई के जोगेश्वरी में रहने वाले 53 साल के आसिफ करादिया को भारतीय नागरिकता मिलने का रास्ता अभी पूरी तरह से साफ नहीं हो सका है। भारत सरकार ने उनसे कहा है कि उन्हें भारतीय नागरिक के रूप में पहचान मिल सकती है लेकिन उसके साथ शर्त यह है कि उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता छोड़नी पड़ेगी। हालांकि, पाकिस्तान में जन्मे करादिया ने पहले ही इस बात का दावा किया है कि वह कभी भी पाकिस्तानी नागरिक नहीं रहे हैं। ऐसे में उनके पाकिस्तानी नागरिकता छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। करादिया के मामले पर टिप्पणी करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी कहा था कि यह एक यूनीक केस है। दरअसल करादिया की मां का जन्म पाकिस्तान में हुआ था। उन्होंने एक भारतीय नागरिक से शादी की थी। जब उन्हें पहला बच्चा होने वाला था तो परिवार के रिवाज के मुताबिक वह अपने मायके कराची चली गई थीं। वहीं पर आसिफ का जन्म हुआ था। अपने जन्म के दो साल बाद साल 1967 में करादिया अपनी मां के साथ मुंबई वापस आ गए और तबसे यहीं हैं। आसिफ की मां को साल 1972 में ही भारत की नागरिकता हासिल हो गई थी। 
करादिया की मुसीबत साल 2012 में उस वक्त शुरू हुई जब उन्होंने हज जाने के लिए पासपोर्ट का आवेदन किया था। चार साल बाद सरकार ने उन्हें पाकिस्तान निर्वासित करने के लिए धमकाया। जिसके बाद वह मामले को हाई कोर्ट ले गए। कोर्ट ने इस 'यूनीक' मामले में राज्य और केंद्र सरकार को विचार करने की सलाह दी। इसके बाद गृह मंत्रालय ने करादिया से संपर्क साधते हुए कहा है कि वह उन्हें भारत की नागरिकता देने के लिए तैयार हैं लेकिन इसके लिए शर्त यह होगी कि उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता छोड़ने के दस्तावेज देने होंगे। करादिया के वकील ने केंद्र के इस सुझाव को नॉन-ऐप्लीकेशन ऑफ माइंड करार दिया है। उन्होंने कहा है कि जब आसिफ शुरू से ही यह कहते आए हैं कि वह कभी पाकिस्तान के नागरिक रहे ही नहीं तब यह कहना कि उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता छोड़नी पड़ेगी, पूरी तरह से नॉन-ऐप्लीकेशन ऑफ माइंड है। पिछली सुनवाई में हाई कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिलाया था कि केंद्र ने जब राज्य सरकार से आसिफ करादिया के पासपोर्ट का विवरण मांगा था तब राज्य सरकार ने इसके जवाब में इसे एक अनुचित मांग कहा था। हालांकि, करादिया ने पहले ही कोर्ट को यह बता दिया था कि साल 1967 में वह अपनी मां के पासपोर्ट पर भारत वापस आए थे। साल 1972 में जब उनकी मां ने भारतीय नागरिकता ग्रहण की थी तब भी आसिफ नाबालिग थे। ऐसे में उनके पिता ने सोचा था कि मां के साथ बच्चे को भी भारतीय नागरिकता मिल जाएगी। 

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