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24 Dec 2018

बंद हो जाएगा देश में 1,300 करोड़ का कोख का कारोबार : राष्ट्रीय

आणंद (गुजरात)। सरोगेसी बिल के लोकसभा से पारित होने के बाद 'सरोगेसी कैपिटल ऑफ इंडिया' कहे जाने वाले गुजरात के आणंद का एक तबका बेहद मायूस है। यह तबका सरोगेसी के कारोबार से जुड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी का आधार यही है। जिले में लगभग 3,000 लोगों को रोजगार मुहैया कराने वाले सरोगेसी के कारोबार पर अब संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इससे पूरा एक ईकोसिस्टम जुड़ा है, जिसमें डॉक्टर्स, नर्स, ट्रैवेल एजेंट, होटल और रेस्तरां, सुपर स्टोर्स इत्यादि शामिल हैं। देश में 1,300 करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार पर अचानक तलवार लटकने से इससे जुड़े लोगों में बेचैनी का बढ़ना लाजिमी है। यह कारोबार नैतिक रूप से सही है या गलत, इसपर इसके विरोधी तथा पक्षधर दोनों के अलग-अलग तर्क हैं। उल्लेखनीय है कि लोकसभा ने सरोगेसी (रेग्युलेशन) बिल, 2016 पारित कर दिया है, जो सरोगेसी के कॉमर्शिलय इस्तेमाल को रोकेगा और यह एक दंडनीय अपराध बन जाएगा। इस बिल के मौजूदा ड्राफ्ट के मुताबिक, ऐसे हेट्रोसेक्शुअल कपल जिनकी शादी को 5 साल से ज्यादा हो चुके हैं और जिन्हें किसी मेडिकल कारण से बच्चा नहीं हो सकता और इसका उनके पास सबूत (सर्टिफिकेट) है, सिर्फ वही सरोगेसी का इस्तेमाल कर सकेंगे।जिले में इस बिजनस से जुड़े एक मशहूर अस्पताल की चौथी मंजिल पर चंडीगढ़ की रहने वाली गुरशरण अरोड़ा एक बच्चे को गोद में लेकर पुचकारती दिखीं। सरोगेसी की मदद से ही उन्हें 15 दिन पहले वह बच्चा मिला है। उन्होंने कहा, 'मुझे पांच बार मिस्कैरेज हुआ, जिसके बाद डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। सरोगेसी की मदद से मैं मां बन पाई। लेकिन, सरकार अन्य औरतों से मां बनने की ख्वाहिश कैसे छीन सकती है।' 
देशभर में फैला कारोबार 
आणंद स्थित आकांक्षा इनफर्टिलिटी क्लिनिक में सरोगेट मदर्स का काम करने वाली महिलाएं उलझन में हैं और वे एक दूसरे से इस विधेयक के बारे में सवाल कर रही हैं। इस अस्पताल का संचालन करने वाली डॉ. नैना पटेल ने साल 2010 से लेकर अब तक सालाना 100 से अधिक बच्चों का जन्म कराया है। अस्पताल में 62 महिलाएं गर्भावस्था के विभिन्न चरणों में हैं। भारत में कॉमर्शल सरोगेसी का कारोबार 1,300 करोड़ रुपये से अधिक का है। यह कारोबार अब देशभर में फैल चुका है। 
मर्जी से बनती हैं सरोगेट मदर 
सरोगेसी का काम करने वाली 32 वर्षीय काजल परोजिया दो बच्चों की मां हैं और उन्होंने अपनी मर्जी से यह काम चुना है। उनके चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही है। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य अपने दोनों बच्चों की अच्छी पढ़ाई-लिखाई सुनिश्चित करना था। उन्होंने कहा, 'मेरे पति को हर महीने मात्र 5,000 रुपये मिलते हैं। ऐसी स्थिति में सरोगेट मदर बनने के लिए मुझे जो 3.6 लाख रुपये मिले, उससे मेरे बच्चों का बेहतर भविष्य सुनिश्चित होगा। अब एक छोटा सा घर बनाने के लिए मैं दूसरी बार सरोगेट मदर बनी हूं।' 
विधेयक पारित होने के एक दिन बाद जब डॉ. पटेल सरोगेट मदर्स से मिलने पहुंचीं, तो माहौल में डर और आशंकाएं घुली हुई थीं। डॉक्टर ने संयम बरतते हुए उनसे कहा, 'अगर राज्यसभा भी इस विधेयक को पारित कर देता है, तो यह अस्पताल में सरोगेसी का अंतिम बैच होगा।' डॉक्टर की बात सुनने के बाद सबके चेहरे पर खामोशी छा जाती है। 
ऐक्टिविस्ट कर रहे हैं विरोध 
गरीब महिलाओं के अधिकारों की बात करने वाले ऐक्टिविस्ट गरीब महिलाओं का इस कारोबार में 'शोषण' को लेकर चिंतित हैं। कॉमर्शल सरोगेसी पर रोक लगाने को लेकर अभियान चलाने वाली और लेखिका पिंकी विरानी कहती हैं कि यह विधेयक काफी वक्त से लंबित था। डॉ. पटेल कहती हैं, 'इस मुद्दे पर बहस जल्दबाजी में खत्म नहीं करनी चाहिए। यह विधेयक अस्पष्ट और असंगत है। अगर कोई व्यक्ति परोपकार के लिए अपने किसी निकट संबंधी के लिए सरोगेसी करता है, तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन 'निकट संबंधी' की कोई परिभाषा भी तो नहीं है। कानून बनाना सही है, लेकिन इसपर पाबंदी लगाने से वास्तव में शोषण शुरू हो जाएगा, जिसमें परिवार महिलाओं पर सरोगेट बनने का दबाव डालेंगे।' 
तो पिछले दरवाजे से चलेगा कारोबार 
डॉक्टर ने कहा कि अगर इसपर पाबंदी लगेगी, तो यह पूरा कारोबार पिछले दरवाजे से चलने लगेगा। अभी भी जिन महिलाओं को बच्चे नहीं होते, उन्हें समाज में कितने तरह के ताने सुनने पड़ते हैं, यह उस महिला के सिवा दूसरा कोई नहीं समझ सकता। समय बदल रहा है। आजकल इनफर्टिलिटी के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में यह विधेयक समाजिक असलियत के अनुरूप नहीं है। कानून को इनफर्टिलिटी का सर्टिफिकेट चाहिए, लेकिन यह पुरुषों की इनफर्टिलिटी को नजरअंदाज करता है, गर्भधारण न होने के लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य परेशानियों को भी नजरअंदाज करता है। इस मुद्दों से निपटने के बजाय यह विधेयक केवल इनफर्टिलिटी पर केंद्रित है।' 

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