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6 Nov 2018

हत्या के 38 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से बरी हुआ आरोपी : नई दिल्ली

नई दिल्ली। यूपी में हुई हत्या के एक मामले में हत्याकांड के 38 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को मर्डर के आरोप से बरी किया है। आरोपी को निचली अदालत और इलाहाबाद हाई कोर्ट से उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं है और उसे संदेह का लाभ दिया जाता है। आरोपी को घटना के 38 साल बाद हत्या मामले में बरी किया गया है।यह मामला यूपी के कासगंज जिले के पटियाली थाने इलाके का है। पुलिस के मुताबिक, 25 दिसंबर 1980 को शाम के पांच बजे सियाराम और उसका बेटा कृपाल पंचायत में भाग लेने जा रहे थे। इस दौरान कथित तौर पर आरोपी रामवीर और अन्य पांच मौके पर आए। सभी आरोपी हथियारों से लैस थे। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने राइफल से गोलियां चलाईं। सियाराम को गोली लगी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। इस दौरान वहां हुए शोरशराबे में गांव के लोग आ गए, लेकिन सभी आरोपी हवा में गोली चलाते हुए वहां से भाग गए। मौके पर मृतक के चाचा भी पहुंचे और उनके बयान के आधार पर पुलिस ने हत्या (आईपीसी की धारा-302) और हथियारों के बल पर उपद्रव करने (आईपीसी की धारा-148) और गैर कानूनी काम करने (आईपीसी की धारा-149) का मामला दर्ज कर लिया। 
मामले की सुनवाई हुई और निचली अदालत ने 15 जुलाई 1983 को इस मामले में रामवीर को हत्या मामले में दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। जबकि बाकी पांच आरोपियों को निचली अदालत ने बरी कर दिया। इस दौरान आरोपी रामवीर जमानत पर था उसे कस्टडी में लिया गया। बाद में मामला हाई कोर्ट के सामने आया। इलाहाबाद हाई कोर्ट में आरोपी रामवीर ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी। अन्य आरोपियों का मामला निचली अदालत में ही खत्म हो चुका था क्योंकि राज्य सरकार ने अपील दाखिल नहीं की थी। 28 फरवरी 2012 को हाई कोर्ट ने रामवीर की अपील खारिज कर दी और सजा को बरकरार रखा।फिर मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एएम सप्रे और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने अपने फैसले में कहा कि संदेह नहीं है कि 148 व 149 में ट्रायल कोर्ट ने सभी को बरी किया था। वहीं हाई कोर्ट ने धारा-149 व 148 में रामवीर को सजा देते वक्त कोई जस्टिफिकेशन नहीं दिया। आरोप था कि मौके पर छह लोग थे और अवैध तरीके से जुटे थे। हाई कोर्ट ने इस बात को जस्टिसफाई नहीं किया कि धारा-148 व 149 कैसे बनता है। हाई कोर्ट ने खुद कहा कि इस बात का रेकॉर्ड नहीं है कि आरोपी रामवीर ने हत्या की पूरी प्लॉटिंग और रूपरेखा तय की हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ यह सबूत नहीं है कि उसने हत्या की कहानी खुद लिखी हो। जो बरामद राइफल से और जो मौके से कारतूस मिले उससे साबित नहीं होता है कि उसी राइफल से उक्त गोली चली। ऐसे में आरोपी रामवीर को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया जाता है। 

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