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4 Oct 2018

टिकैत बंधुओं के विरोधी तेवर से टेंशन में बीजेपी : उत्तर प्रदेश


मेरठ। भारतीय किसान यूनियन सड़क पर उतरने के बाद भी दिल्ली में `सबकुछ' नहीं मिलने से निराश है, लेकिन हताश नहीं। यूनियन आगे चुप नहीं बैठेगी। किसानों के लिए `बहुत कुछ’ हासिल करने के लिए फिर हुंकार भरेगी। बीकेयू पुलिस की लाठी और पानी की बौछार से घायल अन्नदाताओं को मिले जख्मों का हिसाब चुकता करने की तैयारी में हैं। घायल किसानों के लिए सरकार से मुआवजा मांगा जाएगा। किसान `हटे हैं, डरे नहीं' के संदेश के साथ अपनी मांगों के लिए जिलों में किसान सम्मेलन करेगी।दरअसल, आधी रात को आंदोलन खत्म करने पर सवालों के घिरी भारतीय किसान यूनियन के नेता अपना रुख सरकार के प्रति कड़ा ही रखना चाहते हैं। सियासी जानकार टिकैत बंधुओं के सरकार विरोधी कड़े तेवरों से वेस्ट यूपी में भारतीय जनता पार्टी और उसके सांसद खुद को टेंशन में महसूस कर रहे हैं। 
बीकेयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत ने दोहराया कि सरकार ने अपनी तानाशाही दिखा दी, हम भी फिर से अपनी ताकत दिखाएंगे। हक हासिल करने के लिए किसान पीछे नहीं हटेगा। ठोस रणनीति से आगे लड़ाई लड़ेंगे। प्रवक्ता राकेश टिकैत फिलहाल सभी जिलों में किसान हित की आवाज उठाने की तैयारी में हैं। अपनी बाकी मांग पूरी कराने और सरकार पर दबाव बाने को बीकेयू जिलों में किसान सम्मेलन करेगी। उनमें सरकार को जगाने की कोशिश होगी।इसी के साथ यूपी बॉर्डर पर पुलिस कार्रवाई में जिन किसानों को चोट पहुंची है, उनके बारे में गांव-गांव से जानकारी एकत्र कर सरकार से पीड़ित किसानों के लिए मुआवजा बीकेयू मांगेगी। आधी रात को आंदोलन समाप्त करने के सवाल उठने पर किसान नेता सफाई दे रहे हैं कि सरकार सत्ता के घमंड में थी। किसान दस दिन से भूखा प्यासा पैदल चल रहा था। टकराव टालने को आंदोलन खत्म किया। आगे आंदोलन के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। 
किसानों के साथ से बल पर 2014 के लोकसभा चुनाव में वेस्ट यूपी के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, कैराना, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, मेरठ, बिजनौर, नगीना, मुरादाबाद, बुलंदशहर, अमरोहा, रामपुर, संभल, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, आगरा, फतेहपुर सीकरी बीजेपी जीती थी। इन सभी सीटों पर किसानों ने खुलकर बीजेपी के पक्ष में खुला समर्थन किया था। किसानों ने बीजेपी पर इस कदर भरोसा किया था कि किसानों के नाम पर सियासत करने का दम भरने वाले आरएलडी नेता अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी को भी किसानों ने तवज्जो नहीं दी थी। नतीजा दोनों को हार का सामना करना पड़ा था। बीजेपी भी किसानों की नाराजगी के बाद चिंतित है कि कहीं 73 प्लस के प्लान पर असर न पड़ जाए। दरअसल किसानों का साथ मिलने के बाद भी बीजेपी को 2014 में 71 सीट जीतने पर 42.63 फीसदी वोट ही मिल सके थे। ऐसे में अगर किसान भी छिटक जाते है तब 51 फीसदी वोट जोड़ना बड़ी चुनौती होगी। यही चिंता बीजेपी और मौजूदा सांसदों को बताई जा रही हैं। सियासी जानकारों का भी मानना है कि अगर किसान नाराज रहा फिर 51 फीसदी वोट हासिल करने का बीजेपी का लक्ष्य पाना मुश्किल हो सकता हैं। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तेवर साफ है कि लाठीचार्ज का वक्त आने पर जवाब देंगे। हम दिल्ली से `हटे हैं, डरे नहीं'। अब आंदोलन जारी रहेगी। 
किसान हित में हमेशा आगे रहने वाले निलौहा गांव के किसान जगबीर सिंह का कहना है कि अब जो हुआ सो हुआ। बार-बार लड़ने से अच्छा है एक बार ही आर-पार हो जाए। किसान दिल्ली में जम जाए। हक हासिल करके ही लौटे। लावड़ के किसान मोहम्मद समी का कहना है कि हर तरफ से किसान की घेराबंदी हैं। फसल के दाम नहीं मिल रहे। पेमेंट नहीं मिला। कर्ज माफ नहीं हुआ। खेत में मरे या आंदोलन में क्या फर्क पड़ता हैं। 
रोहटा के किसान सुनील सिंह आंदोलन जल्द खत्म करने के हक में नहीं थे। सुनील का कहना है कि सरकार अगर किसानों का उत्पीड़न करती, तब उसकी बदनामी होगी। किसानों को एकजुट होकर संघर्ष करना चाहिए। गांव पिनाई के किसान प्रेमपाल सिंह का कहना है कि आंदोलन जारी रहता तब सरकार दो दिन में सारी मांग मानने को मजबूर होती। ऐसा आंदोलन फिर से खड़ा होना चाहिए। 2019 में किसानों की बात नहीं करने वालों को सबक सिखाना चाहिए। 

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