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4 Oct 2018

क्या यही है बापू के सपनों का भारत?


महात्मा गाँधी मात्र भारत ही नहीं अपितु विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक हैं। भारत को आजादी मिलने के बाद जब सारा देश जश्न मना रहा था, तब गाँधी जी साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए आमरण अनशन कर रहे थे। उन्हें आजादी मिलने की ख़ुशी से कहीं अधिक बिखरते भारत की चिन्ता थी। वे चाहते थे कि देश का प्रत्येक नागरिक समान रूप से आजादी और समृद्धि को प्राप्त करे। महान विचारक, दार्शनिक, कुशल राजनेता एवं दूरदृष्टा महात्मा मोहनदास करमचन्द गाँधी ने जिस भारत की कल्पना की थी, आज़ादी के सत्तर वर्ष बाद भी क्या हम उस भारत का निर्माण कर पाये हैं ? यह यक्ष प्रश्न हम सब के सामने है।
गाँधी जी ने अपनी प्रसिद्ध कृति 'मेरे सपनो का भारत' में लिखा है "मैं भारत को स्वतन्त्र और बलवान बना हुआ देखना चाहता हूँ। भारत का भविष्य पश्चिम के उस रक्त−रंजित मार्ग पर नहीं है जिस पर चलते−चलते पश्चिम अब स्वयं थक गया है। पाश्चात्य सभ्यता का मेरा विरोध असल में उस विचारहीन और विवेकहीन नक़ल का विरोध है, जो यह मानकर की जाती है कि एशिया−निवासी तो पश्चिम से आने वाली हरेक चीज की नक़ल करने जितनी ही योग्यता रखते हैं। यूरोपीय सभ्यता बेशक यूरोप के निवासियों के लिए अनुकूल है, लेकिन यदि हमने उसकी नक़ल करने की कोशिश की, तो भारत के लिए उसका अर्थ अपना नाश कर लेना होगा। मैं साहसपूर्वक यह कह सकता हूँ कि जिन शारीरिक सुख−सुविधाओं के वे गुलाम बनते जा रहे हैं उनके बोझ से यदि उन्हें कुचल नहीं जाना है, तो यूरोपीय लोगों को अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। संभव है मेरा यह निष्कर्ष गलत हो, लेकिन यह मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि भारत के लिए इस सुनहरे मायामृग के पीछे दौड़ने का अर्थ आत्मनाश के सिवा और कुछ न होगा। हमें अपने हृदयों पर एक पाश्चात्य तत्वनाश का यह बोध वाक्य अंकित कर लेना चाहिये 'सादा जीवन उच्च चिन्तन'।" गाँधी जी ने राजनेताओं और कथित समाजसेवियों को लक्ष्य करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा है "आज तो यह निश्चित है कि हमारे लाखों−करोड़ों लोगों के लिए सुख−सुविधाओं वाला जीवन संभव नहीं है और हम मुट्ठी भर लोग, जो सामान्य जनता के लिए चिन्तन करने का दावा करते हैं, सुख−सुविधाओं वाले उच्च जीवन की निरर्थक खोज में उच्च चिन्तन को खोने का जोखिम उठा रहे हैं।" 
गाँधी जी के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है कि वे पाश्चात्य सभ्यता और नीतियों के दुष्प्रभावों को भलीभांति समझते थे। उसके मुकाबले में उन्हें भारत का सादा रहन−सहन और परोपकारी नीतियाँ कहीं अधिक उन्नत दिखाई देती थीं। परन्तु दुर्भाग्य से आजादी के बाद से भारत में जिस तेजी से पाश्चात्य सभ्यता ने पाँव पसारे हैं उतनी तेजी से तो तब नहीं पसारे थे जब यहाँ अंग्रेजी शासन था। भौतिकता की अन्धी दौड़ में भागते समाज में आज नैतिकता का कोई मूल्य ही नहीं रह गया है। वे लोग आज अति पिछड़े हुए समझे जाते हैं जो 'सादा जीवन उच्च चिन्तन' को अपने जीवन में धारण करने का प्रयास करते हैं। अब तो उन्हें अकर्मण्य और आलसी तक की संज्ञा भी दी जाने लगी है। गाँधी जी की दृष्टि में "भारत अपने मूल स्वरूप में कर्मभूमि है, भोगभूमि नहीं।" परन्तु आज हमारा प्रत्येक प्रयास भारत को भोगभूमि बनाने पर ही केन्द्रित रहता है। भोगवादी संस्कृति मनुष्य के पतन का मार्ग किस तरह से प्रशस्त करती है, इसके अनगिनत उदाहरणों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। 
लम्बे समय तक सत्ता सुख भोगने की चाहत में शुरू हुई वोट बैंक की राजनीति ने भारतीय संविधान में अब तक जितने परिवर्तन किये हैं उनसे संविधान सम्बन्धी गाँधी जी की मूल अवधारणा एक तरह से नष्ट ही हुई है। उनका कथन था "मैं ऐसे संविधान की रचना करवाने का प्रयत्न करूंगा, जो भारत को हर तरह की गुलामी और परावलम्बन से मुक्त कर दे। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा, जिसमें गरीब से गरीब लोग भी यह महसूस करेंगे कि यह उनका देश है। जिनके निर्माण में उनकी आवाज का महत्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा, जिसमें ऊँचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा और जिसमें विविध सम्प्रदायों में पूरा मेलजोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता के या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। ऐसे सब हितों का जिनका करोड़ों मूक लोगों से कोई विरोध नहीं है, पूरा सम्मान किया जायेगा, फिर वे हित देशी हों या विदेशी। यह है मेरे सपनों का भारत।" 
अब तक की हमारी सरकारें गाँधी जी के इन विचारों की कसौटी पर कितनी खरी उतरी हैं इसे बताने की आवश्यकता नहीं हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध जाकर एस.सी/एस.टी. एक्ट में किया गया बदलाव इसका सबसे ताजा उदाहरण है। हो सकता है इससे समाज के किसी वर्ग का कुछ हित संरक्षित हो सके परन्तु दूसरी ओर समाज के एक बहुत बड़े वर्ग के अहित का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है। आरक्षण जैसी कुव्यवस्था भी इसी मार्ग की अनुगामी है। जबकि गाँधी जी के विचार से उसी हित का सम्मान होना चाहिए जिसका करोड़ों मूक लोगों से कोई विरोध न हो। गाँधी जी ने शराब तथा अन्य नशीली वस्तुओं को समाज के लिए अभिशाप बताया है। क्या शराब या ऐसे अन्य अनेक मादक पदार्थों से देश को अब तक हम बचा पाये हैं? समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज मद्यपान की गिरफ्त में है। जिनकी संख्या घटने की बजाय निरन्तर बढ़ रही है। इस सन्दर्भ में इससे बड़ा विद्रुप और क्या होगा कि गाँधी जी के देश की सरकार स्वयं ही शराब की दुकानें चलवाती है और नशीले पदार्थों के निर्माण व विक्रय के लिए लाइसेन्स जारी करती है। गाँधी जी ने साम्प्रदायिक मेलजोल की परिकल्पना की थी लेकिन वोटबैंक की राजनीति ने देश को अब तक सम्प्रदाय और जाति के खांचों में बाँटने का ही कार्य किया है। 
स्वराज्य के सन्दर्भ में गाँधी जी का बड़ा ही स्पष्ट, सार्थक और तर्कसंगत चिन्तन था। उनके शब्दों में "स्वराज्य एक पवित्र शब्द है, वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्म−शासन और आत्म−संयम है। अंग्रेजी शब्द 'इंडिपेंन्स' अक्सर सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आजादी या स्वच्छन्दता का अर्थ देता है। वह स्वराज्य शब्द में नहीं है। आखिर स्वराज्य निर्भर करता है हमारी आन्तरिक शक्ति पर, बड़ी से बड़ी कठिनाइयों से जूझने की हमारी ताकत पर। सच पूछो तो वह स्वराज्य, जिसे पाने के लिए अनवरत प्रयत्न और बचाए रखने के लिए सतत जागृति नहीं चाहिए, स्वराज्य कहलाने के लायक ही नहीं है।" आजादी के बाद से हम गाँधी जी के स्वराज्य से परे 'इंडिपेंन्स' की दिशा में ही निर्वाध गति से बढ़ते चले जा रहे हैं। परिणामस्वरूप देश में भ्रष्टाचार, स्वेच्छाचार, अपराध और भीड़जनित हिंसा का ग्राफ तीव्र गति से बढ़ रहा है। शासन−प्रशासन का भय भी लोगों में अब धीरे−धीरे समाप्त हो रहा है। जिन गाँधी जी के जन्म−दिवस (2 अक्टूबर) को पूरा विश्व 'अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में मनाता हो, उन्हीं गाँधी जी के देश में हिंसा का ताण्डव दिन−प्रतिदिन चरम पर पहुँच रहा है। हत्या, बलात्कार और लूटपाट की घटनाएँ आम बात हो गयी हैं। ऐसी हर छोटी बड़ी घटना राजनीतिक मुद्दा बन जाती है। क्या यही है बापू के सपनों का भारत?

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