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30 May 2018

छात्र पहुंचाते हैं सहरी, ताकि कोई सिर्फ पानी से ना खोले रोजा : मध्य प्रदेश


भोपाल। शैलेंद्र दुबे और उनके दोस्त रमजान के पवित्र महीने में सहरी से पहले अपना बिस्तर छोड़ देते हैं। वह ऐसा रोजा रखने के लिए नहीं बल्कि शहर के अस्पतालों में इलाज कराने आए मुस्लिम मरीजों के रिश्तेदारों के लिए करते हैं। दरअसल, मुस्लिम मरीजों के साथ पहुंचे तीमारदारों के लिए अस्पताल में रोजा खोलने का कोई इंतजाम नहीं होता। ऐसे में शैलेंद्र और उनके साथी अपने साथ खाने-पीने की चीजें लेकर पहुंचते हैं और रोजेदारों का रोजा खुलवाते हैं।शैलेंद्र के दिमाग में यह विचार एक मुस्लिम महिला को देखने के बाद आया, जिनके पिता अस्पताल में भर्ती थे। रोजा खोलने के वक्त महिला के पास खाने-पीने की कोई चीज नहीं थी, जिसकी वजह से वह सहरी के दौरान पानी पीकर रोजा खोल रही थीं।डेंटल कॉलेज में पढ़ाई करने वाले छात्र शैलेंद्र दुबे ने कहा, '19 मई को मेरे पिता कॉर्डिएक अरेस्ट से जूझ रहे थे और हम उन्हें हमीदिया अस्पताल में इलाज के लिए लेकर पहुंचे थे। रात में जब मैं उनके साथ था तभी मैंने देखा कि एक मुस्लिम महिला पानी के साथ सहरी पूरी कर रही है। इसके बाद मैंने तय किया कि ऐसे लोगों के लिए कुछ करना चाहिए।' 
शैलेंद्र बतातें हैं, 'मैंने अपने दोस्तों को बुलाया और हमने तय किया रमजान के दौरान हम सहरी का वितरण करेगे। अभी जब हमारी कोई कमाई नहीं है तो इसके लिए हम अपनी पॉकेट मनी बचाते हैं और जरूरतमंद पर 50 रुपये खर्च करते हैं। हम उन्हें ऑमलेट, चार पराठे और एक गिलास में मेवे वाला दूध उपलब्ध कराते हैं।' वह बताते हैं, 'इस काम में मेरे 6 दोस्त भी सहायता करते हैं। मेरे दोस्त सईद अली और मैं मिलकर डिलिवरी पहुंचाने का काम करते हैं।' शैलेंद्र के ग्रुप की ही एक सदस्य श्रुति सोनी बताती हैं, 'मैंने दो दिन पहले एक बुजुर्ग महिला को सहरी दी, उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया।' ग्रुप के सदस्य शाहीद खान कहते हैं, 'हम लोगों से कहते हैं कि वे हमें कॉल करके बताएं कि उन्हें खाने के कितने पैकेट्स चाहिए और वे किस अस्पताल में हैं। इसके बाद हम उन्हें सही समय पर सहरी उपलब्ध कराते हैं।' 

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